google.com, pub-7680017245162656, RESELLER, f08c47fec0942fa0 श्रीमद् भागवत् गीता - सभी अध्याय

श्रीमद् भागवत् गीता - सभी अध्याय

SANJAY NIGAM

श्रीमद् भगवद गीता-सभी अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता-प्रथम अध्याय


"अर्जुन विशाद योग" श्रीमद् भगवद गीता के पहले अध्याय (अध्याय 1) का नाम है, जो गीता की शुरुआत को दर्शाता है। इस योग में पृथ्वीकुमार अर्जुन, महाभारत के महत्वपूर्ण युद्ध में अपने आत्मा की दुविधा और आध्यात्मिक संकट के सामने खड़ा होता है। यह अध्याय उस समय की स्थितियों को दर्शाता है जब अर्जुन युद्धभूमि पर अपने बंधुओं, गुरुओं, और रिश्तेदारों को देखकर मोहित और विस्मित हो जाता है। 

कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "अर्जुन विशाद योग" के बारे में हैं: 

 1. अर्जुन की दुविधा: इस योग में, अर्जुन की अंधकारमयी दुविधा का वर्णन किया गया है, जिसमें वह युद्ध के लिए तैयार नहीं है और अपने युद्धभूमि पर खड़ा होकर दुख और संकट में है। 

 2. भगवान कृष्ण का संवाद: भगवान कृष्ण, अर्जुन के अवस्थान का समझाने के लिए उनके साथ अपना विचार साझा करते हैं। 

 3. धर्म की महत्वपूर्ण बहस: इस योग में धर्म, कर्म, और आत्मा के स्वरूप के बारे में महत्वपूर्ण बहस होती है। 

 4. आध्यात्मिक उपदेश: अर्जुन विशाद योग में आध्यात्मिक ज्ञान का प्रारंभ होता है, जो अर्जुन के मानसिक संकट को दूर करने के लिए उपयोगी है। 

इस योग का संदेश है कि मानव जीवन में संघर्ष और विवाद हो सकते हैं, लेकिन सही मार्ग और आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से हम अपने आप को पाने में सक्षम हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-द्वितीय अध्याय 


 "सांख्य योग" श्रीमद् भगवद गीता के द्वितीय अध्याय (अध्याय 2) का नाम है, और इस योग में भगवान कृष्ण अर्जुन को आध्यात्मिक ज्ञान की महत्वपूर्ण बातें सिखाते हैं। यह योग अर्जुन के मन की उदासीनता और अज्ञान को दूर करने के लिए अहम उपदेश देता है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "सांख्य योग" के बारे में हैं: 

 1. आत्मा और देह का विचार: इस योग में आत्मा (सांख्या) और देह के बीच का अंतर समझाया जाता है। यह बताता है कि आत्मा अमर और देह केवल अनित्य है।

 2. कर्म और फल: सांख्य योग में कर्म और उसके फल के बीच का रिश्ता बताया गया है। यह बताता है कि कर्म करना महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके फल में आसक्ति नहीं करनी चाहिए। 

 3. समता: योग में समता का महत्व बताया जाता है, जिसका अर्थ है कि ध्यान में मन को स्थिर रखना चाहिए, बिना किसी प्रकार के अत्यधिक आसक्ति या द्वेष के। 

 4. मोक्ष की प्राप्ति: सांख्य योग द्वारा मोक्ष (मुक्ति) की प्राप्ति के लिए आत्मा को आत्मज्ञान और आत्मविद्या के माध्यम से पहचाना जाता है।

"सांख्य योग" अर्जुन को अपने दायित्वों का निर्णय लेने और सच्चे आत्मा के माध्यम से जीवन को समझने में मदद करता है, जिससे वह अपने कर्मों को सही तरीके से समझता है और धार्मिक दायित्वों का पालन करता है। 

श्रीमद् भगवद गीता-तृतीय अध्याय 


"कर्म योग" श्रीमद् भगवद गीता के तृतीय अध्याय (अध्याय 3) का नाम है, और इस योग में कर्म (क्रिया) का महत्वपूर्ण स्थान है और यह बताता है कि कर्म कैसे धर्मिक और आध्यात्मिक उन्नति का साधन कर सकता है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "कर्म योग" के बारे में हैं: 

 1. कर्म का महत्व: इस योग में कर्म का महत्व बताया जाता है। यह योग कर्म को सिद्धांतिक रूप से महत्वपूर्ण मानता है और यह बताता है कि सही तरीके से कर्म करने से आत्मा की उन्नति होती है। 

 2. कर्मफल से आसक्ति का त्याग: "कर्म योग" में कर्मफल (क्रिया के परिणाम) से आसक्ति को त्यागने का संदेश होता है। यह योग बताता है कि कर्म को देवों के लिए बिना आसक्ति के करना चाहिए।

 3. स्वधर्म का पालन: अपने स्वधर्म का पालन करने का महत्वपूर्ण संदेश दिया जाता है। यह योग बताता है कि हमें अपने स्वधर्म के अनुसार कर्म करना चाहिए, बिना किसी भय या आसक्ति के। 

 4. कर्म और योग: इस योग में कर्म को एक प्रकार के योग के रूप में दर्शाया जाता है, जिसका अर्थ है कि कर्म को मानसिक और आध्यात्मिक साधन के रूप में किया जा सकता है।

"कर्म योग" का मुख्य संदेश है कि हमें अपने कर्मों को आत्मा की उन्नति के लिए धर्मिक रूप से करना चाहिए, और कर्मफल के साथ निष्काम रूप से काम करना चाहिए। 

 श्रीमद् भगवद गीता-चतुर्थ अध्याय 


"ज्ञान कर्म संन्यास योग" श्रीमद् भगवद गीता के चौथे अध्याय (अध्याय 4) का नाम है, और इस योग में ज्ञान (विचारणात्मिक ज्ञान) और कर्म (क्रियाओं का निष्काम कर्म) के महत्वपूर्ण संदेश दिए जाते हैं। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "ज्ञान कर्म संन्यास योग" के बारे में हैं: 

 1. दुर्लभ ज्ञान का महत्व: इस योग में दुर्लभ और अनमोल ज्ञान की महत्वपूर्ण बात की जाती है। यह ज्ञान अनादि गुरुओं से मिलता है और यह आत्मा का स्वरूप, परमात्मा, और योग के रहस्यों के बारे में होता है। 

 2. कर्म का महत्व और संन्यास: इस योग में कर्म का महत्व और संन्यास के फायदे पर बात की जाती है। यह बताता है कि कर्म से बिना आसक्ति के किये जाने वाले कर्म मनुष्य को आत्मा के सम्पूर्ण ज्ञान की ओर प्रकट कर सकते हैं। 

 3. योग के महत्व: "ज्ञान कर्म संन्यास योग" में योग के महत्व पर भी बात की जाती है, जैसे कि भक्ति और ध्यान योग की श्रेष्ठता के बारे में। 

 4. योग का आदर्श: यह योग अर्जुन को उपदेश देता है कि हर कर्म को देवों के लिए और ईश्वर के साथ एकत्रित भाव से किया जा सकता है, जिससे आत्मा का मोक्ष हो सकता है। 

 "ज्ञान कर्म संन्यास योग" का मुख्य संदेश है कि सही ज्ञान के साथ कर्म करने से हम अपने कर्मों को आत्मा की ऊँचाइयों की ओर ले जा सकते हैं और अपने आत्मा को परमात्मा के साथ एकत्रित कर सकते हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-पंचम अध्याय 


 "कर्म संन्यास योग" श्रीमद् भगवद गीता के पाँचवें अध्याय (अध्याय 5) का नाम है, और इसमें कर्म और संन्यास के मध्य संतुलन का महत्वपूर्ण संदेश होता है। यह योग बताता है कि सही तरीके से कर्म करने का तात्पर्य है अपने कर्मों को साध्य लक्ष्य की ओर दिशा देना, और संसारिक बंधनों से मुक्त होने का मार्ग हो सकता है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "कर्म संन्यास योग" के बारे में हैं: 

 1. कर्म की समर्पण: यह योग समर्पित कर्म का महत्वपूर्ण बात की जाती है। यह बताता है कि कर्म को देवों के लिए किया जाना चाहिए, बिना किसी आसक्ति के। 

 2. संन्यास का संदेश: इस योग में संन्यास का महत्व और संन्यासी के लक्ष्य का वर्णन होता है। संन्यास का तात्पर्य भगवान की प्राप्ति और मुक्ति की ओर दिशा देने से होता है। 

 3. कर्म का पुनर्निर्मूलन: यह योग कर्म के पुनर्निर्मूलन के विषय में भी चर्चा करता है, जिसमें यह बताता है कि जीवन में कर्म का सही तरीके से उपयोग कैसे किया जा सकता है। 

 4. आत्मा की अनुभवित आत्मता: "कर्म संन्यास योग" में आत्मा की अनुभवित आत्मता और परमात्मा के साथ एकत्रित होने का तात्पर्य होता है, जिससे व्यक्ति मुक्ति प्राप्त करता है। 

इस योग का मुख्य संदेश है कि सही तरीके से कर्म करने और संन्यास के माध्यम से हम आत्मा को परमात्मा के साथ एकत्रित कर सकते हैं और संसारिक बंधनों से मुक्त हो सकते हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-षष्ठम् अध्याय 


"ध्यान योग" श्रीमद् भगवद गीता के छटे अध्याय (अध्याय 6) का नाम है, और इसमें ध्यान और ध्येय के महत्व का महत्वपूर्ण संदेश होता है। यह योग बताता है कि कैसे ध्यान के माध्यम से आत्मा को प्राप्त किया जा सकता है और आत्मज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "ध्यान योग" के बारे में हैं:

 1. ध्यान की महत्वपूर्णता: इस योग में ध्यान की महत्वपूर्णता को बताया जाता है। ध्यान के माध्यम से मन को नियंत्रित किया जा सकता है, और आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने का मार्ग खुलता है। 

 2. आसन की महत्वपूर्णता: "ध्यान योग" में आसन (योगिक आसन) का महत्व बताया जाता है, जिसका उद्देश्य शरीर को स्थिर और सुविधाजनक बनाना है, ताकि ध्यान की प्रक्रिया सुविधाजनक रूप से किया जा सके।

 3. मन की नियंत्रण: यह योग मन की नियंत्रण के महत्व को बताता है। ध्यान के माध्यम से मन को नियंत्रित किया जा सकता है और अनवांछित विचारों को दूर किया जा सकता है।

 4. ध्यान की अभ्यास: यह योग ध्यान की अभ्यास की महत्वपूर्णता पर बल देता है। यह बताता है कि ध्यान को नियमित रूप से और आत्मसमर्पण के साथ किया जाना चाहिए। 

 "ध्यान योग" का मुख्य संदेश है कि ध्यान के माध्यम से हम आत्मा को परमात्मा के साथ एकत्रित कर सकते हैं और आत्मज्ञान की प्राप्ति कर सकते हैं। यह योग आत्मा की शांति, सुख, और मुक्ति की ओर एक प्रमुख मार्ग हो सकता है। 

श्रीमद् भगवद गीता-सप्तम अध्याय


"अक्षरपरम योग" श्रीमद् भगवद गीता के सातवें अध्याय (अध्याय 8) का नाम है, और इसमें अक्षर परम ब्रह्म के प्राप्ति के माध्यम के महत्व का संदेश होता है। यह योग बताता है कि कैसे आत्मा अनंत परमात्मा के साथ एकत्रित हो सकती है और अनंत मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है। कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं "अक्षरपरम योग" के बारे में हैं:

 1. अक्षर परम ब्रह्म: इस योग में बताया जाता है कि अक्षर परम ब्रह्म (अनंत ब्रह्म) को प्राप्त करने का मार्ग केवल उन्नत आत्मज्ञान और ध्यान के माध्यम से हो सकता है।

 2. योग की प्रक्रिया: यह योग योग की प्रक्रिया को बताता है, जिसमें योगी को अपने मन को परमात्मा में लगाने और आत्मा को अक्षर परम ब्रह्म से जोड़ने के लिए अपने ध्यान का अभ्यास करना चाहिए।

 3. योगी की भूमिका: इस योग में योगी की भूमिका और उसकी तय की भूमिकाओं का वर्णन होता है, जिसमें उसकी साधना और ध्यान के माध्यम से प्रगति का मार्ग बताया जाता है।

 4. अनंत मोक्ष की प्राप्ति: "अक्षरपरम योग" का मुख्य संदेश है कि अनंत परमात्मा के साथ एकत्रित होने के माध्यम से योगी अनंत मोक्ष की प्राप्ति करता है और संसार के चक्र से मुक्त हो जाता है। 

इस योग का मुख्य संदेश है कि आत्मा को परमात्मा के साथ एकत्रित करने के माध्यम से हम अनंत मोक्ष की प्राप्ति कर सकते हैं, जिससे हमारा आत्मा अनंत शांति, सुख, और परम ब्रह्म के साथ एक हो सकता है। 


श्रीमद् भगवद गीता-अष्टम अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के आठवें अध्याय में, जिसे "अक्षर ब्रह्म योग" भी कहा जाता है, भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अनंत ब्रह्म और योग के महत्वपूर्ण पहलुओं के बारे में उपदेश देते हैं। इस अध्याय में कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं हैं:

 1. अनंत ब्रह्म का वर्णन: भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अनंत ब्रह्म के रूप, स्वरूप, और महत्व का वर्णन करते हैं। वे बताते हैं कि अनंत ब्रह्म जगत् के सारे विषयों का आदिकारण है और उसके बिना कुछ भी असंभव है।

 2. योग की महत्वपूर्णता: इस अध्याय में योग की महत्वपूर्णता को बताया जाता है। भगवान कहते हैं कि योग के माध्यम से जीवन को दुखों से मुक्ति मिलती है और आत्मा परमात्मा के साथ मिल जाती है।

 3. सम्पूर्ण प्राणियों का अंत: इस अध्याय में भगवान बताते हैं कि समय के साथ सम्पूर्ण प्राणियों का अंत होता है और फिर वे पुनर्जन्म का अनुभव करते हैं।

 4. ध्यान का महत्व: इस अध्याय में ध्यान के महत्व को बताया जाता है। भगवान कहते हैं कि आत्मा को परमात्मा में ध्यान करने के माध्यम से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

 5. भक्ति का फल: भगवान श्रीकृष्ण यहां भक्ति के मार्ग को भी महत्वपूर्ण बताते हैं और कहते हैं कि भक्ति द्वारा भगवान का दर्शन करने और परमात्मा के साथ मिलने का साधन हो सकता है। 

"अक्षर ब्रह्म योग" का मुख्य संदेश है कि योग के माध्यम से हम अनंत ब्रह्म को प्राप्त कर सकते हैं, जिससे हमारा आत्मा मुक्ति, शांति, और अनंत सुख की प्राप्ति कर सकता है। 

श्रीमद् भगवद गीता-नवम अध्याय 

श्रीमद् भगवद गीता के नवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को भक्ति और भगवान की महत्वपूर्ण भूमिकाओं के बारे में उपदेश देते हैं। इस अध्याय के महत्वपूर्ण बिंदुएं निम्नलिखित हैं: 

 1. भक्ति का महत्व: नौंवा अध्याय भक्ति के महत्व को महत्वपूर्ण रूप से बताता है। भगवान कहते हैं कि भक्ति एक सबसे उत्तम मार्ग है जिसके माध्यम से आत्मा परमात्मा के पास पहुँच सकती है। 

 2. चार भक्ति योग: इस अध्याय में चार प्रमुख भक्ति योग का वर्णन किया जाता है: - कर्म योग: अपने कर्मों को भगवान के लिए समर्पित करने का मार्ग। - भक्ति योग: भगवान की भक्ति में लगाने का मार्ग। - ध्यान योग: भगवान की ध्यान में लगाने का मार्ग। - ज्ञान योग: ज्ञान की खोज के माध्यम से भगवान को पहचानने का मार्ग। 

 3. भगवान के स्वरूप का वर्णन: भगवान अपने स्वरूप का वर्णन करते हैं और बताते हैं कि वे सम्पूर्ण जगत् का संरक्षक हैं और सम्पूर्ण ब्रह्मांड में व्याप्त हैं। 

 4. भगवान के प्राप्ति के उपाय: इस अध्याय में भगवान के प्राप्ति के उपाय के रूप में ध्यान, पूजा, और भक्ति की महत्वपूर्ण विधियाँ बताई जाती हैं। 

 5. भगवान की अनुग्रह: भगवान की कृपा और अनुग्रह का महत्व भी इस अध्याय में उजागर किया जाता है। भक्ति के माध्यम से भगवान की कृपा प्राप्त होती है और भक्त उनके पास पहुँचता है। 

इस अध्याय का मुख्य संदेश है कि भक्ति भगवान के पास पहुँचने का सबसे सुरक्षित और सरल मार्ग है और भगवान की कृपा और अनुग्रह से ही हम उनके पास पहुँच सकते हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-दशम अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के दसवें अध्याय को "विभूति योग" या "दिव्य रूप का दर्शन" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन कराते हैं और अर्जुन को अपने अद्वितीय महत्त्व के बारे में शिक्षा देते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं:

 1. भगवान के दिव्य स्वरूप का दर्शन: इस अध्याय में, भगवान अपने दिव्य स्वरूप का अर्जुन को दर्शाते हैं। अर्जुन देखते हैं कि भगवान का स्वरूप अत्यंत प्रकारणीय और अद्वितीय है, जिसमें वह सम्पूर्ण ब्रह्मांड का आदिकारण हैं। 

 2. भक्ति का महत्व: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि भक्ति ही सर्वोत्तम मार्ग है, जिसके माध्यम से भगवान का दर्शन किया जा सकता है। वे भक्ति के माध्यम से ही आत्मा को परमात्मा के पास पहुँचता है।

 3. भगवान की विभूतियाँ: इस अध्याय में, भगवान अपनी अनगिनत विभूतियों का वर्णन करते हैं, जिससे वे अपने महत्त्व और शक्ति का प्रमुख अंश प्रकट करते हैं।

 4. सम्पूर्ण जगत् के आदिकारण: भगवान कहते हैं कि वे सम्पूर्ण जगत् का आदिकारण हैं और सम्पूर्ण जगत् उनके विभूतियों का प्रकट रूप है।

 5. अर्जुन का उपदेश प्राप्त करना: इस अध्याय में अर्जुन भगवान के दर्शन करके विचलित हो जाते हैं और वे भगवान से अपने कर्तव्य का निर्वाचन करने के लिए प्रार्थना करते हैं। 

"विभूति योग" का मुख्य संदेश है कि भगवान का दिव्य स्वरूप अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और भक्ति के माध्यम से ही हम उनके पास पहुँच सकते हैं। इस अध्याय में भगवान की अनगिनत विभूतियों का वर्णन भी है, जो हमारे लिए उनकी महत्वपूर्णता को सिद्ध करते हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-एकादश अध्याय 


 श्रीमद् भगवद गीता के ग्यारहवें अध्याय को "विश्वरूप दर्शन योग" या "विश्वरूप संदर्शन" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन के सामने अपने दिव्य और विश्वरूप को प्रकट करते हैं और अर्जुन को उनके महत्वपूर्ण उपदेश देते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. भगवान का दिव्य रूप: इस अध्याय में भगवान अपने दिव्य रूप को प्रकट करते हैं, जिसमें वे सम्पूर्ण ब्रह्मांड का सर्वाधिक और अद्वितीय स्वरूप होते हैं। इस दर्शन में भगवान की अद्वितीय शक्ति और महत्व का प्रमुख अंश प्रकट होता है। 

 2. भक्ति का मार्ग: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि भक्ति उनके पास पहुँचने का सर्वोत्तम मार्ग है। अर्जुन को भक्ति के माध्यम से ही उनके पास पहुँचने का संदेश दिया जाता है। 

 3. दिव्य रूप के दर्शन का प्रभाव: अर्जुन भगवान के दिव्य रूप के दर्शन से विचलित हो जाते हैं और वे उनसे मार्गदर्शन के लिए प्रार्थना करते हैं। 

 4. जीवन का उद्देश्य: इस अध्याय में भगवान जीवन का उद्देश्य और कर्मों की महत्वपूर्णता के बारे में चर्चा करते हैं। 

 5. भक्ति की महिमा: भगवान इस अध्याय में भक्ति की महिमा को बताते हैं और कहते हैं कि भक्ति से ही आत्मा परमात्मा के पास पहुँच सकती है।

"विश्वरूप दर्शन योग" का मुख्य संदेश है कि भगवान का दिव्य रूप महत्वपूर्ण है और भक्ति के माध्यम से हम उनके पास पहुँच सकते हैं। यह अध्याय भक्ति, विश्वरूप, और जीवन का उद्देश्य के महत्व को बताता है और अर्जुन को उनके कर्मों का निर्वाचन करने के लिए प्रोत्साहित करता है। 


श्रीमद् भगवद गीता-द्वादश अध्याय 


 श्रीमद् भगवद गीता के बारहवें अध्याय को "भक्ति योग" या "भक्ति के माध्यम से भगवान का प्राप्ति" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को भक्ति योग के माध्यम से भगवान की प्राप्ति के विभिन्न पहलुओं के बारे में उपदेश देते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. भक्ति का विवरण: इस अध्याय में भक्ति के मार्ग का विस्तार से वर्णन किया जाता है। भक्ति का मुख्य संदेश है कि आत्मा को परमात्मा के प्रति प्रेम और समर्पण के साथ भक्ति में लगाना होता है।

 2. भक्ति के प्रकार: इस अध्याय में भक्ति के विभिन्न प्रकारों का वर्णन किया गया है, जैसे की सात्त्विक भक्ति, राजसिक भक्ति, और तामसिक भक्ति।

 3. भक्ति के फल: इस अध्याय में भक्ति के फल का वर्णन किया गया है। भगवान कहते हैं कि भक्ति के माध्यम से आत्मा परमात्मा के साथ मिल जाती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है।

 4. भक्ति के आदर्श: इस अध्याय में कुछ महान भक्तों के उदाहरण दिए जाते हैं, जैसे प्रहलाद, ध्रुव, प्रह्लादा, अर्जुन, और अन्य। इन भक्तों के जीवन से हमें भक्ति के महत्व का संदेश मिलता है।

 5. भक्ति का साधना: इस अध्याय में भक्ति के साधना के विभिन्न तरीकों का वर्णन किया जाता है, जैसे की ध्यान, पूजा, और कीर्तन।

"भक्ति योग" का मुख्य संदेश है कि भक्ति के माध्यम से ही हम भगवान के पास पहुँच सकते हैं और आत्मा को परमात्मा से मिलाने का सबसे साधन मार्ग है। इस अध्याय में भक्ति के अनुग्रह से हमारे आत्मा को शांति, प्रेम, और मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है।

श्रीमद् भगवद गीता-त्रयोदश अध्याय 


 श्रीमद् भगवद गीता के तेरहवें अध्याय को "क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग"के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा और अनात्मा के बीच के अंतर के बारे में शिक्षा देते हैं और उन्हें आत्मा के महत्व के बारे में ज्ञान देते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का विवरण: इस अध्याय में क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विचार का वर्णन किया जाता है। क्षेत्र शरीर को प्रतिनिधित करता है, जबकि क्षेत्रज्ञ आत्मा होता है, जो शरीर को जानता है और अनुभव करता है। 

 2. आत्मा की महत्वपूर्णता: इस अध्याय में आत्मा की महत्वपूर्णता पर बल दिया जाता है। भगवान कहते हैं कि आत्मा ही जीवन का अंश है और उसके परिपेक्ष्य में शरीर और मानसिक तंत्र निरर्थक हैं। 

 3. ज्ञान का मार्ग: इस अध्याय में ज्ञान के मार्ग का वर्णन किया गया है। भगवान कहते हैं कि आत्मा का ज्ञान ही सबसे महत्वपूर्ण ज्ञान है, और वही सच्चे मोक्ष का मार्ग होता है। 

 4. भगवान के स्वरूप का वर्णन: इस अध्याय में भगवान के स्वरूप का वर्णन किया गया है, जिसमें वे सम्पूर्ण जगत् का कारण होते हैं और सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होते हैं। 

 5. आत्मा के परमात्मा के साथ एकता: इस अध्याय में आत्मा और परमात्मा के बीच की एकता का महत्वपूर्ण संदेश है। भगवान कहते हैं कि आत्मा को परमात्मा के साथ एक होना चाहिए, जैसे की जल का समुद्र में विलीन हो जाना।

"क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ विभाग योग" का मुख्य संदेश है कि आत्मा की महत्वपूर्णता है और ज्ञान के माध्यम से हम अपनी आत्मा को समझ सकते हैं और परमात्मा के साथ एक हो सकते हैं। इस अध्याय में आत्मा के महत्व, ज्ञान के मार्ग, और भगवान के दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। 

श्रीमद् भगवद गीता-चतुर्दश अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के चौदहवें अध्याय को "दैवी सम्पद् विभाग योग" या "दिव्य और दैवी स्वभावों का विवेचन" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दो प्रकार के स्वभाव, अर्थात् दिव्य और दैवी, के बारे में विस्तार से विवेचन करते हैं और इनके विशेषता को बताते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. दिव्य स्वभाव का विवरण: इस अध्याय में भगवान दिव्य स्वभाव के गुणों का विवरण करते हैं, जैसे की दया, क्षमा, आत्मसंयम, और अहिंसा। ये गुण आत्मा के आध्यात्मिक विकास को संघटित करते हैं। 

 2. दैवी स्वभाव का विवरण: इस अध्याय में दैवी स्वभाव के गुणों का विवरण दिया गया है, जैसे की अ हंकार, अभिमान, क्रोध, और आलस्य। ये गुण आत्मा के प्रति आकुलता और मानसिक उन्नति को रोकते हैं।

 3. दिव्य और दैवी स्वभाव की जीत: भगवान कहते हैं कि दिव्य स्वभाव के गुणों को पाकर आत्मा उन्नत होती है, जबकि दैवी स्वभाव के गुणों को पाकर आत्मा संघटित होती है। 

 4. भक्ति का मार्ग: इस अध्याय में भक्ति के मार्ग का महत्वपूर्ण उपदेश दिया गया है। भगवान कहते हैं कि भक्ति के माध्यम से हम उनके पास पहुँच सकते हैं और उनके आदर्शों को पाने का मार्ग होता है। 

"दैवी सम्पद् विभाग योग" का मुख्य संदेश है कि आत्मा के स्वभाव को समझना महत्वपूर्ण है और दिव्य स्वभाव के गुणों को विकसित करना चाहिए। इस अध्याय में आत्मा के स्वभाव के विभिन्न पहलुओं का विवेचन किया जाता है, जो हमारे आत्मिक विकास में महत्वपूर्ण होते हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-पंचदश अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के पंद्रहवें अध्याय को "पुरुषोत्तम योग" या "ऊँची परम दिव्य पुरुष की महिमा" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य रूप का वर्णन करते हैं और उनकी महिमा को बताते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. भगवान के दिव्य रूप का वर्णन: इस अध्याय में भगवान का दिव्य रूप का वर्णन किया गया है, जिसमें वे अपने अद्भुत और आश्चर्यकर परम रूप में प्रकट होते हैं। यह दृश्य अर्जुन को भगवान की अद्भुत महिमा का दर्शन कराता है।

 2. परम दिव्य पुरुष की महिमा: इस अध्याय में भगवान की महिमा का वर्णन किया गया है, जिसमें उनके परम शक्तिशाली और सर्वव्यापी स्वरूप की महिमा होती है।

 3. भगवान के भक्तों के प्रति प्रेम: इस अध्याय में भगवान के प्रति उनके भक्तों के प्रति उनका अत्यंत प्रेम और दया का वर्णन किया गया है। 

 4. भगवान का मार्ग: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि वे ही सर्वोपाधि-विनिर्मुक्त, शुद्ध, और सर्वज्ञ हैं, और उन्हें प्राप्त करने के लिए भक्ति और सर्वोपाधि-रहितता की दिशा में प्राप्त करनी चाहिए। 

 5. भगवान की प्राप्ति का मार्ग: इस अध्याय में भगवान की प्राप्ति के लिए भक्ति की महत्वपूर्णता का संदेश दिया जाता है, और उन्हें उनके भक्तों के साथ हमेशा रहने का आशीर्वाद दिया जाता है।

"पुरुषोत्तम योग" का मुख्य संदेश है कि भगवान का दिव्य रूप और उनकी महिमा अत्यंत अद्भुत है और उन्हें प्राप्त करने के लिए भक्ति का मार्ग सबसे महत्वपूर्ण होता है। इस अध्याय में भगवान के दिव्य रूप का अद्भुत दर्शन किया गया है और भक्ति की महत्वपूर्णता पर बल दिया गया है। 

श्रीमद् भगवद गीता-षष्ठदश अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के सोलहवें अध्याय को "दैवी सम्पद् विभाग योग" या "दिव्य और दैवी प्रकृति का वर्णन" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण मनुष्यों के दो प्रकार के प्रकृति, अर्थात् दिव्य और दैवी प्रकृति, का विवेचन करते हैं और इनके गुणों को वर्णन करते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. दिव्य प्रकृति के गुण: इस अध्याय में दिव्य प्रकृति के गुणों का वर्णन किया गया है। इनमें साम्प्रदायिकता, आत्मसंयम, दया, और अनन्यता शामिल हैं। ये गुण आत्मा के पूर्णता की ओर ले जाते हैं।

 2. दैवी प्रकृति के गुण: इस अध्याय में दैवी प्रकृति के गुणों का वर्णन दिया गया है, जैसे कि अहंकार, क्रोध, लोभ, और अभिमान। ये गुण आत्मा को बंधन में डालते हैं।

 3. गुणों का प्रभाव: इस अध्याय में भगवान बताते हैं कि हर व्यक्ति के अंदर ये दो प्रकार के गुण होते हैं, और ये गुण उनके विचारों, भावनाओं, और कृत्यों को प्रभावित करते हैं। 

 4. भगवान की भक्ति: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि वे ही दैवी प्रकृति के गुणों का पालन करने वाले भक्तों के मन को अपनी ओर खींचते हैं और उनकी मुक्ति का मार्ग दिखाते हैं। 

 5. भक्ति का मार्ग: इस अध्याय में भक्ति के मार्ग का महत्वपूर्ण संदेश दिया जाता है, और यह बताया जाता है कि भगवान के प्रति प्रेम और सेवा के माध्यम से ही मोक्ष प्राप्त हो सकता है। 

"दैवी सम्पद् विभाग योग" का मुख्य संदेश है कि हमारे गुणों का हमारे मानसिक और आत्मिक स्वरूप पर काफी प्रभाव होता है और हमें दिव्य प्रकृति के गुणों का विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। भक्ति के माध्यम से हम भगवान के पास पहुँच सकते हैं और उनके आदर्शों को प्राप्त कर सकते हैं। 

श्रीमद् भगवद गीता-सप्तदश अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के सत्रहवें अध्याय को "श्रद्धा त्रय विभाग योग" या "तीन प्रकार की श्रद्धा का वर्णन" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा का वर्णन करते हैं और उनके प्रति भक्ति और सेवा का मार्ग दिखाते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. सत्त्विक श्रद्धा: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि सत्त्विक श्रद्धा के धारक भगवान के प्रति निरंतर आसक्त रहते हैं और उन्हें प्रेम और सेवा का भाव होता है। 

 2. राजसिक श्रद्धा: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि राजसिक श्रद्धा के धारक केवल अपने स्वार्थ के लिए भगवान की पूजा करते हैं, और वे अपने इच्छाओं को पूरा करने के लिए उनका सहारा लेते हैं। 

 3. तामसिक श्रद्धा: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि तामसिक श्रद्धा के धारक अंधविश्वासों में रहते हैं और वे अज्ञान में डूबे रहते हैं, और अपने अच्छे और बुरे कर्मों का फल भगवान पर डालते हैं। 

 4. भक्ति का मार्ग: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि सत्त्विक श्रद्धा के साथ भक्ति करना सर्वोत्तम होता है और यह भक्तों को मुक्ति का मार्ग दिखाता है। 

"श्रद्धा त्रय विभाग योग" का मुख्य संदेश है कि भक्ति के साथ सत्त्विक श्रद्धा का विकास करना अत्यंत महत्वपूर्ण है और यह भक्तों को भगवान के पास पहुँचने का सही मार्ग दिखाता है। सत्त्विक श्रद्धा के साथ भक्ति करना हमें आत्मा की मुक्ति का मार्ग दिलाता है। 

श्रीमद् भगवद गीता-अष्टतदश अध्याय 


श्रीमद् भगवद गीता के अठारहवें अध्याय को "पुरुष और प्रकृति योग" या "पुरुष की महिमा और प्रकृति का वर्णन" के रूप में भी जाना जाता है। इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण पुरुष की महिमा और प्रकृति के कार्यों का वर्णन करते हैं, और व्यक्ति की आत्मा को परमात्मा के साथ कैसे जुड़ा हुआ है यह बताते हैं। निम्नलिखित हैं कुछ महत्वपूर्ण बिंदुएं: 

 1. पुरुष की महिमा: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि पुरुष, अर्थात् आत्मा, अविनाशी और अकर्म होता है। वह शरीर के द्वारा भौतिक जगत में कर्म करता है, परन्तु वह उसके पारमात्मिक रूप के बारे में जागरूक होता है। 

 2. प्रकृति के कार्यों का वर्णन: इस अध्याय में प्रकृति के कार्यों का वर्णन किया गया है, जिसमें सत्त्व, रज, और तम गुणों के प्रभाव से आत्मा शरीर के कार्यों में लिपटा रहता है। 

 3. कर्म का स्वाभाविक विवरण: इस अध्याय में कर्म के स्वाभाविकता और आत्मा के निष्कर्ष के बारे में विवरण दिया जाता है। 

 4. आत्मा का मुक्ति का मार्ग: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि आत्मा को शरीर से अलग करने का मार्ग ज्ञान, ध्यान, और भक्ति है।

 5. भक्ति का महत्व: इस अध्याय में भगवान कहते हैं कि भक्ति आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने का मार्ग है, और वह भक्तों के प्रति अपना प्यार और दया बनाए रखते हैं। 

"पुरुष और प्रकृति योग" का मुख्य संदेश है कि आत्मा अविनाशी होती है और वह शरीर के कार्यों के लिए उसके द्वारा नहीं बंधी होती है। यह भक्ति के मार्ग का महत्वपूर्ण और गहरा विवरण भी देता है, जिससे आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने का मार्ग प्राप्त होता है। 

 निष्कर्ष 


श्रीमद् भगवद गीता में कुल 18 अध्याय होते हैं, और इन अध्यायों के मुख्य निष्कर्ष कुछ इस प्रकार हैं: 

 1. अर्जुन विशाद योग (अध्याय 1): इस अध्याय में अर्जुन भगवान के सामने अपने मनोबल के संकट का वर्णन करते हैं, और भगवान श्रीकृष्ण उन्हें मार्गदर्शन देते हैं कि कर्म करने में समर्पित रहना चाहिए। 

 2. सांख्य योग (अध्याय 2): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा के अमरता और शाश्वतता का उपदेश देते हैं और कर्म और भक्ति के माध्यम से आत्मा को परमात्मा से मिलाने का मार्ग दिखाते हैं।

 3. कर्म योग (अध्याय 3): इस अध्याय में कर्म का महत्व और योग्य कर्म करने का उपदेश दिया जाता है, जिसके माध्यम से आत्मा का समृद्धि के साथ सम्बंध बना रह सकता है। 

 4. ज्ञान कर्म संन्यास योग (अध्याय 4): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान के महत्व को बताते हैं और कर्म से ज्ञान की प्राप्ति का मार्ग दर्शाते हैं।

 5. कर्म संन्यास योग (अध्याय 5): इस अध्याय में कर्म संन्यास के महत्व का वर्णन किया जाता है, और यह बताया जाता है कि कर्म और संन्यास दोनों के माध्यम से आत्मा का मोक्ष प्राप्त हो सकता है। 

 6. ध्यान योग (अध्याय 6): इस अध्याय में ध्यान के महत्व का वर्णन किया गया है और यह बताया जाता है कि मन को नियंत्रित करके आत्मा का साक्षात्कार कैसे किया जा सकता है।

 7. अक्षरपरम योग (अध्याय 7): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हैं और भक्तों को उनकी श्रद्धा के माध्यम से उनके पास आने का मार्ग दिखाते हैं। 

 8. अक्षरब्रह्म योग (अध्याय 8): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अक्षर ब्रह्म के विचार का वर्णन करते हैं और मरण के समय मन को कैसे परमात्मा में स्थित किया जा सकता है।

 9. राजविद्या राजगुह्य योग (अध्याय 9): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी अद्भुत दिव्य शक्तियों का प्रकटन करते हैं और भक्तों को भगवान क े प्रति श्रद्धा और भक्ति के महत्व का उपदेश देते हैं। 

 10. विभूति योग (अध्याय 10): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी दिव्य विभूतियों का वर्णन करते हैं और यह बताते हैं कि उनके अत्यंत महत्वपूर्ण रूपों के माध्यम से वह पुरुषों के पास पहुंचते हैं। 

 11. विश्वरूप दर्शन योग (अध्याय 11): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपने विश्वरूप का दर्शन करते हैं, जिसमें वह अपनी दिव्य और भयंकर स्वरूपों को प्रकट करते हैं। 

 12. भक्ति योग (अध्याय 12): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण भक्ति के विभिन्न प्रकार का वर्णन करते हैं और यह बताते हैं कि भक्ति का महत्व क्या है। 

 13. क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग (अध्याय 13): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के विचार का वर्णन करते हैं और आत्मा के विशेषता का मार्ग दिखाते हैं। 

 14. गुण त्रय विभाग योग (अध्याय 14): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण गुणों के तीन प्रकार का वर्णन करते हैं - सत्त्व, रज, और तम, और यह बताते हैं कि इन गुणों का प्रभाव कैसे होता है। 

 15. पुरुषोत्तम योग (अध्याय 15): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपने सर्वोत्तम स्वरूप का वर्णन करते हैं और वह बताते हैं कि आत्मा को कैसे उनकी ओर आकर्षित किया जा सकता है। 

 16. दैवासुर सम्पद्विभाग योग (अध्याय 16): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण दैवी और आसुरी प्रकृति के गुणों का वर्णन करते हैं और भक्तों को दैवी गुणों का अनुसरण करने का संदेश देते हैं। 

 17. श्रद्धा त्रय विभाग योग (अध्याय 17): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण तीन प्रकार की श्रद्धा का वर्णन करते हैं - सत्त्विक, राजसिक, और तामसिक श्रद्धा, और यह बताते हैं कि किस प्रकार की श्रद्धा आत्मा को परमात्मा के पास ले जाती है। 

 18. मोक्ष संन्यास योग (अध्याय 18): इस अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कर्मयोग और ज्ञानयोग के माध्यम से मोक्ष कैसे प्राप्त किया जा सकता है, और यह बताते हैं कि कर्मयोगी, ज्ञानी, और भक्त कैसे होते हैं।

 ये अध्याय श्रीमद् भगवद गीता के मुख्य निष्कर्ष हैं, जो जीवन के विभिन्न पहलुओं के लिए मार्गदर्शन प्रदान करते हैं और आत्मा को परमात्मा के साथ मिलाने का मार्ग दिखाते हैं।

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